गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मस्तक नहीं झुकेगा।

वन तिमिर में छोडकर मुरदा हमे,
कमर कसकर वो भागने वालो  ।
खोलो नयन विश्राम से देखो जरा,
वनफूलो की भांति अब भी जिंदा हूँ।

राज गहरे है धंसे गहरे हृदय में   ।
पर अधर फूल सी मुस्का रही है।
जल रहे हैं दिप  धू धू कर  निरंतर।
पर दरारों से सिसकती आ रही है ।

झाड दो तुम  धूल को तलवार से    ।
छा जाओ धरा के  शीर्ष पर घटा से ।
करा दो रंग रोगन फिर से बंदीगृह का।
हो सके तो व्योम पर भी पहरा लगा दो।

हृदय को हांकती धीमे धीमे शीतल हवा।
सहिष्णुता सर पे अभिशाप को है टांकती।
जलरही है आग ठंडी पडी सोयी चिता में।
युगों से चीखती निर्दयी आह है गगन में।

भा रहा है तुम्हें सुप्रभाती गंगा का किनारा ।
पर धरा पर भटकर कोण तुझको ना दिखे।
छा रही है कली पे, भंवर वैभव सिंगार सी।
पर मरघटों में गूंजी हुंकार तुझको ना दिखे।

जग रहे हैं शोणित दर्द सिने में अंगार लिए।
उठ रही भुजायें दोधारी नग्न तलवार लिए।
सज रही है सुख समाधि गौरव घूंघट काढे।
खुल रही नयन चिंगारी और ज्वाला लिए।

तोड सको तो वर्षो से टुटे खंजर तोडो तुम।
मोड सको तो बहते सिंधु जल को मोडो तुम।
माथे पे रंजीत खून का दाग पर नहीं मिटेगा।
गर्व से खडा हिमालय तुमसे नहीं झुकेगा।

बहुत रो लिए सिंह वन में दहाडने वाले।
खुन से सन कर भी ना सिसकारने वाले।
खोल चुके हैं पैरों से निष्ठुर जंजीरों को।
पांडु पुत्र अब प्रलय से नाता जोड चुके हैं।

अब भूखंडों को खुली दिशायें मिल जायेंगी।
अब यज्ञकूंड मे जल उठेगी फिर से ज्वाला ।
अब गंगा को मिल जायेंगी फिर  टूटी कश्ती।
टुटे खंडर को फिर अपना इतिहास  मिलेगा।

जल उठेगीं फिर से प्राचीर की मशालें।
वृहत नभ से झरेगी सुरज की सुकिरण । 
तरुण प्रणय कलरव फिर खिल उठेगा  ।
गौरवशाली मानव अब नहीं झुकेगा।

द्वारा
आदर्श पराशर
14/10/14

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