मंगलवार, 11 नवंबर 2014

क्या करे?


भूख जब तलक न आए
पेट मे खुदबुद ना मचाये
मेज पर थाली सजाये
आदमी फिर क्या करे ?

रात की आबोहवा में
बह रही शीतल पवन हो
सर टिकाने के सिवा पर
मानव करे तो क्या करे ? 

जल रहे दिप धू धू कर भयंकर
महलों की रोशनदान से
झाँक कर, टिमटिमाते
तारें करें तो क्या करे।

फट चुकी चुनर निरंतर
मौन यौवन की तन पर
खिलखिलाते फूल का
कांटे करे तो क्या करे?

झुक गई उस डाल का
माचिस की बारूदी भाल का
सिक रही उन गाल का
अंगारे करे तो क्या करे ?

सिता के  जनानी जज्बात का
राम के लज्जा और माथ का 
सूपनखा के ओछी बात का
रावण करे तो क्या करे?

अंगेजो की धिनौनी बिसात का
नये लडको की टेढी जात का 
भूख के अहसास का
दलित कविता करे तो क्या करे?

By
Adarsh Prashar 

रविवार, 9 नवंबर 2014

किश्त

मुस्तकबिल हो किसी का,
पर माजी कलम की है।
कफन हो किसी का ,
पर दामन वतन की है।
नमक का हक अदा करते,
वो हिंदू हो या मुसलमां।
जरूरत है तो बस,
बाकी अमन की है।
कितनी भी मंहगी हो जाये,
फूल मगर ।
बहार है तो है,
पर चमन की है।
सालों की सजा काटे,
जो है पाक मगर ।
मुकद्दर मौत तो हिस्से,
में पापी की ही है।
चल रहा हो भले ही,
महफिल में लौंडा नाच मगर।
महफिल तो हमेशा से ही,
शाकी की ही है।
करे लाख छीछालेदर ,
हलकू नौटंकी में।
कीमत लाखों मे ,
मगर हाथी की ही है।

दुनिया

हो रही है सभा
दिन दुखियारो के यहाँ।
रो रही है मुनिया
इन कछारो के यहाँ।
जा रहा है ,
कल सुबह नत्थू अंधेरे ,
पास के उस गांव में।
है जहाँ से बोली आई ,
मुनिया के दिल की है।
दाम का निर्णय करेगें,
गांव के सब लोग मिलकर।
पास में मुनिया मतारी ,
अजब मुश्किल में है।
सोचिए कैसी दशा होगी ,
मुनिया बेचारी की अभी।
झोंकी जा रही जो,
अंधेरे बिल में है।
भीड में छुपकर जो
बैठा है चंदर,
ओसारे के पास।
बिनती और सुधा उसकी,
बसती मुनिया के दिल में है।
है दशा दशरथ की ,
मुनिया के बाप की।
किस कदर खामोश वह
भडी महफिल में है।
हर रोज रोते होंगे
राम अपने राज्य को।
दिन और दुखियों की सीता।
रावण की झोली में है।



शनिवार, 8 नवंबर 2014

स्वपन

सपनों की दुनिया में मैं
अकेला रात भर जागता
गीत गाता रहा हूँ।
जी । जीत की खुशीयां
मनाता रहा हूँ।

जीत जो नींद पे हमको मिली है
उस उपलक्ष्य में
खुशियां मनाता रहा हूँ।
जिंदगी से थका हुआ ,
लेकिन हर्षाता रहा हूँ।

रात जो खींच देती है
हमारे दुखों पर परदा
उसी परदे की ओट से
नाराज मैं जयजयकार
सुखों की लगाता रहा हूँ।

तृप्ति मिलती है
ऐसी की बस मत पूछिए।
चेहरे की चमक को भी
चैन से गीतों में संगीत की
भांति मिलाता रहा हूँ।

बस कभी कभी कुछ
अजीब डर लगता है कि
कहीं जग ना जाउँ
इसीलिए चादर को
सर पे सरकाता रहा हूँ।

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

पंडित जी

अरे बाप रे सुना है प्यार में झगडे
प्यार की निशानी है।
मेरे परोस में इसकी
जीती जागती कहानी है।

सुबह की चाय के झगडे मे
प्यार की कुछ ऐसी हवा चलती है।
बिस्कुट प्लेट में मरद के भांती स्थिर ।
चाय  औरत की तरह उबलती  है।

जब खाते हैं पंडित जी तो सर पे
पंखे के बदले पंडिताइन रहती है।
शायद इसी कारण पंडित जी पे
छाई दुबली पतली चिकनाई रहती है।

किराना दुकान हो या हो
महतो की सब्जी का ठेला।
हर चौक चौराहे  पर चलता  है
पंडिताइन का खेला।

पंडित बेचारे क्या करें
रहते हैं रेलमपेल में
क्योकि ठेलती आ रही है
सदियों से पंडिताइन अपने खेल से ।

एक दिन पंडित ने सोचा
आज चुप रहना नहीं है।
संवैधानिक चुनौती को
अब सहना नहीं है

सामने से आ गई
पंडिताइन लहराते हुए।
सहमे पंडित ने सोचा
अब कुछ कहना नहीं है।

देख कर पंडित जी को
आता है एक ख्याल।
बंधा है बैल एक बेबस
खूंटे में कसाई के ।
 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

बटखडा

जो अपनी बात पर
खडा होता है।
कहीं ना कहीं
सलीबों पे टंगा होता है।

जात मजदूर की
पुछी नही जाती।
वो तराजू पर 
बस बटखडा होता है।

चाहत में कहा किसी का
भला होता है।
वो बस समाज का
मसखरा होता है।

मयस्सर रात को नहीं
भोजन की थाली जिसे
वो ही मंदिरों की
द्वार पर खडा होता है।

लिखी जाती हैं जिसके
कारण हजारों लेख पन्नो पर
वो विचार भी
कही अधमरा होता है।

दौलतराम की दिवाली

दौलतराम के आंगन मे आज
दिवाली मनाई जा रही है।
हर दिवार को देखो जैसे
अंधेरी रात में ईठलाई जा रही है ।

सजा है चांद सा रौशन दिया
हर ओर।
हर रंग और कुचे को
दौलत में मिलाई जा रही है।

जरा सी देर में खनकेगा
हर मेज पे सिक्का।
अभी दौलतराम की नवेली दुल्हन
नीलम से सजाई जा रही है ।

जो वो कोने में बैठा है,
फेंकू कुछ देर से।
वो हनुमान है
नाटक में ईन कसाई के।

जलेगी आग जो लंका में
धू धू कर
बांधी जा रही हे पूंछ में
इस मिताई के।

मिलेगा जुट का कपडा
नत्थू और कुशेसर को।
अभी रावण के हाथों ही
लंका जलाई जा रही है ।

वो जो डब्बा बंद है तोहफा
रखा कोने में तिपाई पे
चमकता खून है उसपे
पलटन की कमाई के

रहेगा रात भर जारी
जो नाटक चल रहा है।
सुबह फेंकू के हिस्से में
आयेगा भोज का जूठन ।

ये किस्मत है
हमारे थारू ओर तराई के
जलेंगे राम भी आग में
इन कसाई  के ।

योजना

जख्म दिल के उभर आते हैं
जब कोई चोट खाता है।
दो आसूं टपकते है
और गालों पर सुख जाता है।

कहो करें कोई तो,
फिर क्या करे?
आसूं पोछे कि बस
उन्हीं से रूठ जाये।

सितम सहने की आदत हो
तो कोई सब्र करे।
इंसाफ चाहे तो
तो क्या कोई सब्र करे।

अजीब होते है
तुगलकी फरमान जारी हररोज
कि कोई चाहे तो चाहे
पर सब्र करे

मैं चाहता हूं
एक स्वपन बनूँ
कोई चाहे तो  मुझे करे स्वीकार
कोई चाहे तो फिर सब्र करे।

रंग घूलते है
जिद जल मे मिलने की
अपना समायोजन
कोई योजना नहीं होती ।

किस्मत

यूँ ही नहीं लिखी जाती
गोरे पन्नो पर सुनहरी स्याही से
रंग निचोड़े जाते है
कली और फुल से 

फूल को मिलता है
तो क्या मिलता है
कहानी भी लिखी जाती है
उसी की खून से

कब तलक बेजार हो
सिता रोती रहे ।
हर कलम इतिहास में
बस औजार होता है।

लिखी जाती है जवानो के
मजार पर अमर शहीद मगर
खामोशी ही
उसका फलसफा होता है

तमन्ना होती है हर कब्र की
बनने का ताजमहल
पर सब के नसीब में
कहाँ शाहजहां होता है

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

शिकवा

हो जमाने से शिकवा तो
करे कोई तो क्या करे
मुसाफिर राह के मुस्तकबिल चले
तो जमाना क्या करे

हमराह हो शिकवा
माजी से फसाने से
राहे नजर असणार को
रौशन करे तो क्या करे

हजारों रंग है दुनिया के
नजारे देखने लायक
बेआबरू हो कोई तो
फलसफा फिर क्या कहे

चलो चलते हैं कहीं दूर
बहुत दूर
रस्मो रिवाजों के माफिक
सुखनवर चले तो क्या चले

द्वारा
आदर्श पराशर