गुरुवार, 6 नवंबर 2014

पंडित जी

अरे बाप रे सुना है प्यार में झगडे
प्यार की निशानी है।
मेरे परोस में इसकी
जीती जागती कहानी है।

सुबह की चाय के झगडे मे
प्यार की कुछ ऐसी हवा चलती है।
बिस्कुट प्लेट में मरद के भांती स्थिर ।
चाय  औरत की तरह उबलती  है।

जब खाते हैं पंडित जी तो सर पे
पंखे के बदले पंडिताइन रहती है।
शायद इसी कारण पंडित जी पे
छाई दुबली पतली चिकनाई रहती है।

किराना दुकान हो या हो
महतो की सब्जी का ठेला।
हर चौक चौराहे  पर चलता  है
पंडिताइन का खेला।

पंडित बेचारे क्या करें
रहते हैं रेलमपेल में
क्योकि ठेलती आ रही है
सदियों से पंडिताइन अपने खेल से ।

एक दिन पंडित ने सोचा
आज चुप रहना नहीं है।
संवैधानिक चुनौती को
अब सहना नहीं है

सामने से आ गई
पंडिताइन लहराते हुए।
सहमे पंडित ने सोचा
अब कुछ कहना नहीं है।

देख कर पंडित जी को
आता है एक ख्याल।
बंधा है बैल एक बेबस
खूंटे में कसाई के ।
 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

बटखडा

जो अपनी बात पर
खडा होता है।
कहीं ना कहीं
सलीबों पे टंगा होता है।

जात मजदूर की
पुछी नही जाती।
वो तराजू पर 
बस बटखडा होता है।

चाहत में कहा किसी का
भला होता है।
वो बस समाज का
मसखरा होता है।

मयस्सर रात को नहीं
भोजन की थाली जिसे
वो ही मंदिरों की
द्वार पर खडा होता है।

लिखी जाती हैं जिसके
कारण हजारों लेख पन्नो पर
वो विचार भी
कही अधमरा होता है।

दौलतराम की दिवाली

दौलतराम के आंगन मे आज
दिवाली मनाई जा रही है।
हर दिवार को देखो जैसे
अंधेरी रात में ईठलाई जा रही है ।

सजा है चांद सा रौशन दिया
हर ओर।
हर रंग और कुचे को
दौलत में मिलाई जा रही है।

जरा सी देर में खनकेगा
हर मेज पे सिक्का।
अभी दौलतराम की नवेली दुल्हन
नीलम से सजाई जा रही है ।

जो वो कोने में बैठा है,
फेंकू कुछ देर से।
वो हनुमान है
नाटक में ईन कसाई के।

जलेगी आग जो लंका में
धू धू कर
बांधी जा रही हे पूंछ में
इस मिताई के।

मिलेगा जुट का कपडा
नत्थू और कुशेसर को।
अभी रावण के हाथों ही
लंका जलाई जा रही है ।

वो जो डब्बा बंद है तोहफा
रखा कोने में तिपाई पे
चमकता खून है उसपे
पलटन की कमाई के

रहेगा रात भर जारी
जो नाटक चल रहा है।
सुबह फेंकू के हिस्से में
आयेगा भोज का जूठन ।

ये किस्मत है
हमारे थारू ओर तराई के
जलेंगे राम भी आग में
इन कसाई  के ।

योजना

जख्म दिल के उभर आते हैं
जब कोई चोट खाता है।
दो आसूं टपकते है
और गालों पर सुख जाता है।

कहो करें कोई तो,
फिर क्या करे?
आसूं पोछे कि बस
उन्हीं से रूठ जाये।

सितम सहने की आदत हो
तो कोई सब्र करे।
इंसाफ चाहे तो
तो क्या कोई सब्र करे।

अजीब होते है
तुगलकी फरमान जारी हररोज
कि कोई चाहे तो चाहे
पर सब्र करे

मैं चाहता हूं
एक स्वपन बनूँ
कोई चाहे तो  मुझे करे स्वीकार
कोई चाहे तो फिर सब्र करे।

रंग घूलते है
जिद जल मे मिलने की
अपना समायोजन
कोई योजना नहीं होती ।

किस्मत

यूँ ही नहीं लिखी जाती
गोरे पन्नो पर सुनहरी स्याही से
रंग निचोड़े जाते है
कली और फुल से 

फूल को मिलता है
तो क्या मिलता है
कहानी भी लिखी जाती है
उसी की खून से

कब तलक बेजार हो
सिता रोती रहे ।
हर कलम इतिहास में
बस औजार होता है।

लिखी जाती है जवानो के
मजार पर अमर शहीद मगर
खामोशी ही
उसका फलसफा होता है

तमन्ना होती है हर कब्र की
बनने का ताजमहल
पर सब के नसीब में
कहाँ शाहजहां होता है

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

शिकवा

हो जमाने से शिकवा तो
करे कोई तो क्या करे
मुसाफिर राह के मुस्तकबिल चले
तो जमाना क्या करे

हमराह हो शिकवा
माजी से फसाने से
राहे नजर असणार को
रौशन करे तो क्या करे

हजारों रंग है दुनिया के
नजारे देखने लायक
बेआबरू हो कोई तो
फलसफा फिर क्या कहे

चलो चलते हैं कहीं दूर
बहुत दूर
रस्मो रिवाजों के माफिक
सुखनवर चले तो क्या चले

द्वारा
आदर्श पराशर

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

टूट गया हूँ मैं

सब कसमों और वादों से
छुट गया हूँ मैं
सच कहूं तो सीसे की भांति
टूट गया हूँ मैं
रोता नहीं मैं आसुओं मे
भूल चुका हूं मैं
सच कहूं तो गम के समंदर में
डूब चुका हूँ मैं
दामन है दागदार बस
ऊब चुका हूँ मैं
जलती में छोड घर को
फूंक चुका हूँ मै
राहों में है मोड हजारों हजार
सच कहूं तो
सीधे सडक पर रास्ता
खो चुका हूं मै

द्वारा
आदर्श पराशर

मुलजिम

झांक् कर है देखता
सडक के मुहाने से
अजीब रंज है
उसको जमाने से

है मुहल्ले का
वही मुलजिम वही हाकिम
दर बदर फिरता
वही पापी वही काफी

गुजरते वक्त से सिखा है
उसने चलना अंगारों पर
सभी कहते हैं उसको
कभी मय कभी शाकी

जमाना भुल जाता है
बडे शान से जिसको
उन्ही ठूंठो में बसती है
काफिर की निशानी 

फकत इक शौक ने
रक्खा है जिंदा उसे
निकल आयेगी कभी
मुर्दों की कहानी

द्वारा
आदर्श पराशर
25-09-2014

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सिनेमा

जिंदगी क्या है
एक सिनेमा का सेट
कभी इस रंग में
कभी उस रंग में
कभी हंसी के छींटे
कभी आंसूओं की लडी
कभी सफल कभी फिसड्डी
कभी हिरो कभी विलेन
कभी चोर कभी सिपाही
कभी राजा कभी रंक
कभी पात्र बदलते हैं
कभी दिशा
पर
रील चलती ही रहती है
तबतक जबतक
सिनेमा खत्म न हो
और फिर
कुछ लोग ताली बजाते हैं
कुछ गाली देते हैं
लेकिन कोई कुछ नहीं करता
बस हंसते हुए घर चले जाते हैं

द्वारा
आदर्श पराशर
17-09-2014

रविवार, 14 सितंबर 2014

मैं कवि बन जाता

अगर पेट नहीं होता
तो मैं कवि बन जाता
गीतों का रेट नहीं होता
तो मैं कवि बन जाता
सच है ।
आज हिंदी रोती है
जिंदगी सिनेमा का
सेट ना होता तो
तो मैं कवि बन जाता
कुत्ता इमानदार है
क्योंकि सडक पर है
रूपये का वेट ना होता तो
तो मैं कवि बन जाता
कहाँ ढूँढे दिल की
बीमारी का इलाज
मोहब्बत खेल न होता तो
तो मैं कवि बन जाता

द्वारा
आदर्श पराशर
14-09-2014